(If you prefer hearing an audio version of this blog as you read - click on Play above. The blog has been read by theatre actor and director Agastya Kohli, who is also the son of Shri Narendra Kohli. At the request of some friends I have also added English Translations of a few uncommon Hindi words, for ease of understanding)
महाभारत की मूल कहानी से हम सब अवगत है। हाँ, कुछ पात्र और कुछ घटनाएँ ऐसी अवश्य होंगी जो हमें स्मरण ना हों। किंतु अगर कोई कहे कि, सिर्फ़ इन रिक्तियों को भरने के लिए, नरेंद्र कोहली का महाभारत की कथा पर आधारित, 8 खण्डों का औपन्यासिक संग्रह ‘महासमर’ पढ़ लो, तो ना तो ये समय का सदुपयोग होगा और ना ही संभवतः इस उद्देश्य की पूर्ति होगी। परंतु यदि किसी का उद्देश्य, महाभारत की परतों को खोलते और तह करते हुए, कुछ अन्वेषण अथवा कुछ विवेचन करना है, तो उनके लिए ये उपन्यास श्रेठ सिद्ध होगा।
(अन्वेषण = exploration; विवेचन = Interpretation)
जिस प्रकार किसी संग्रहालय में एक गाइड, पर्यटकों को पूर्व निर्धारित क्रम में, कलाकृतियाँ दिखाता चलता है, कोई कृति छोड़ देता है और किसी किसी कृति के सामने रुक कर उसका विस्तृत विवरण देता है, कुछ उसी प्रकार, नरेंद्र कोहली भी, ‘महासमर’ में, पाठकों को महाभारत की कथा का वृतांत तो देते ही हैं, पर बहुधा कहानी को रोक कर, उस प्रसंग का अपने पात्रों के मुख से, अथवा उनकी मनःस्थिति के वर्णन द्वारा, अपना दृष्टिकोण रखते हैं। कभी तो वह अपना परिप्रेक्ष्य कोई स्पष्ट निष्कर्ष तक प्रज्वलित करते हैं और कभी अनुत्तरित प्रश्नों के माध्यम से अपना अभिप्राय इंगित कर आगे बढ़ जाते हैं।
(मनःस्थिति = state of mind; परिप्रेक्ष्य = perspective ; अनुत्तरित : unanswered; अभिप्राय इंगित करना =indicate what is meant)
अधिकांश लोग सहमत होंगे कि महाभारत के किसी भी पात्र के नैतिक मूल्यांकन के निष्कर्ष पर आम सहमति होना कठिन है। कोई भी पात्र दूध का धुला नज़र नहीं आता। प्रत्येक पात्र किसी न किसी प्रसंग में विवादास्पद भूमिका निभाता है। पाठकगण एक मत से, ये भी तय नहीं कर सकते कि कौन नायक है और कौन खलनायक।कई पाठकों के लिए, इस महाकथा की विवादास्पदता ही उसका मुख्य आकर्षण है। कथा भी हज़ारों वर्ष पूर्व के समाज के पृष्ठभूमि में आधारित है। उस समय क्या शिरोधार्य था, क्या स्वीकार्य था और क्या अस्वीकार्य - इस बारे में भी पाठकों की अपनी अपनी धारणाएँ हैं। अगर इस पर सहमति हो भी जाए, तो भी, पढ़ते समय पाठक अपने विद्यमान मूल्य प्रणाली से छान कर ही कथा का अंतर्ग्रहण करता है।
(विवादास्पद = controversial; शिरोधार्य = honourable; अंतर्ग्रहण करना = imbibe)
ऐसी स्थिति में कोई साधारण लेखक, जिसका उद्देश्य मात्र लोकप्रियता है ,वो सम्भवतः पूर्वसिद्ध या मध्य मार्ग को चुन कर, कहानी के धूसरत्व को उभार के, अधिकांश पाठकों की स्वीकृति पाने की चेष्टा करेगा। परन्तु नरेंद्र कोहली साधारण ग्रंथकारों से भिन्न हैं। ‘महासमर’ को पढ़ते हुए ये स्पष्ट हो जाता है कि उनकी सम्पूर्ण कृति में युधिष्ठिर असंदिग्ध नायक है। युधिष्ठिर के चरित्र को वे धर्मराज के स्तंभपाद से कभी भी गिरने नहीं देते। इसके ठीक विपरीत कौरवों में उन्हें कुछ भी सराहनीय नहीं दिखता। उनकी दृष्टि में कर्ण भी खलनायक ही है। पितामह भीष्म भी प्रायः कुछ थके थके से लगते हैं। कुछ समीक्षकों को ये सुस्पष्टता अटपटी सी लगती है। इसके लिए वे कोहलीजी की आलोचना भी करते है। लेकिन क्यूँकि कोहलीजी लोकप्रिय मत के आधार पर नहीं लिखते, शायद इसीलिए, विरोधाभास से, आधुनिक हिंदी साहित्य के वे श्रेठतम और लोकप्रिय लेखकों में गिने जाते हैं।
(धूसरत्व = greyness; असंदिग्ध = unmistakeable; स्तंभपाद = pedestal; विरोधाभास = paradox)
यद्यपि ‘महासमर’ उपन्यास, महाभारत को कालक्रमानुसार ही वर्णित करता है, परंतु कोहलीजी ने प्रत्येक खण्ड में पाठकों का ध्यान, कथा के एक भाव अथवा पहलू पे केंद्रित किया है। वह भाव उस खण्ड का शीर्षक भी है। मैंने अभी तक केवल दो ही खण्ड पढ़ें हैं। तीसरा खण्ड अभी आरंभ ही किया है। इस लिए उन्ही दो भागों का संक्षिप्त विवरण दे रहा हूँ। तो आप इसे अंतरिम समीक्षा ही मानिए।
(कालक्रमानुसार = chronological)
‘महासमर’ का पहला भाग है - ‘बंधन’।
कथा के घटनाक्रम की दृष्टि से, ‘बंधन’ हस्तिनापुर के राजा शान्तनु की मछुआरे दशराज की पुत्री सत्यवती के प्रति आसक्ति और गंगापुत्र भीष्म की आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा से लेकर, पांडवों एवं कौरवों की बाल अवस्था तक का वृतांत है।
(आसक्ति = attachment, infatuation)
वस्तुतः ये विशेषकर पिता शान्तनु, रानी सत्यवती और देवव्रत (भीष्म) के जीवन मूल्यों एवं कर्म बंधनो के परस्पर संघर्ष से उत्पन्न मानसिक ऊहापोह का विश्लेषण है। क्या देवव्रत (भीष्म) का त्याग, जो उसने पिता की आसक्ति से उत्पन्न हुई अभिलाषा को परिपूर्ण करने के लिए किया, निस्वार्थ था? क्या त्याग परिभाषा से ही निस्वार्थ होता है? क्या त्याग सर्वथा अभिग्रहण से श्रेठ होता है? यदि त्याग निष्फल हो जाए, तो फिर भी क्या वो त्याग त्याग माना जाएगा? क्या व्यक्तिगत बंधन सामाजिक बंधनो के अधीन होते हैं अथवा स्वाधीन?
(ऊहापोह = contemplation; अभिग्रहण = acquisition)
महासमर के पहले भाग ’बंधन’ में ही लेखक अपनी शैली से पाठकों की जिज्ञासा बढ़ाता भी है लेकिन एक प्रकार उनकी अपेक्षाओं को सीमित भी करता है। लेखक अप्रत्यक्ष रूप से ये स्पष्ट कर देता है, यद्यपि महाभारत उसकी सृजित कहानी नहीं है, परंतु ये ‘महासमर’ उसका वृतांत है। इस वृतांत का वह और सिर्फ़ वह ही निर्देशक हैं और पाठकगण यदि उसके निर्देशन में इस वृतांत का आनंद ले सकता है, तो वे सादर आमंत्रित है । अथवा संग्रहालय में महाभारत पर और भी कई पुस्तकें हैं जो इस से सरल हों - पाठक उनमें से कोई चयन कर ले।
कुछ सोच विचार के बाद, कोहलीजी को नतमस्तक करते हुए, मैंने इस शृंखला का दूसरा खण्ड उठा लिया
‘महासमर’ का दूसरा भाग है - ‘अधिकार’।
इस भाग में कथा तेज़ वेग पकड़ती है। पांडव और कौरव राजकुमार बाल्यावस्था को छोड़ , अपनी शिक्षा पूर्ण कर, सबल युवक योद्धाओं में विकसित हो जाते हैं। द्रोण की द्रुपद से मित्रता, शत्रुता में परिवर्तित होती है। कहानी बारी बारी से, कर्ण का गुरु द्रोण की युद्धशाला में तिरस्कार, उसकी दुर्योधन से घनिष्ट मित्रता, उसकी अर्जुन से प्रतिस्पर्धा, कृपाचार्य का योगदान, द्रोणाचार्य की गुरु दक्षिणा जैसे अनेक घटनाक्रम पर केंद्रित होती है। भाग के अंत में युधिष्ठिर का युवराज्याभिषेक और हस्तिनापुर में कृष्ण का आगमन होता है।
ये भाग पिछले भाग के मानसिक एवं भावनाओं के चिंतन को पीछे छोड़, राजनैतिक और भौतिक प्रश्नों को उठाता है। धृतराष्ट्र का हस्तिनापुर पर अधिकार, एक राजा का अधिकार है या फिर राज-प्रतिनिधि का। यदि धृतराष्ट्र राजा है तो दुर्योधन को क्या युवराज घोषित होने का अधिकार है? गांधारी के होते हुए कुंती के क्या अधिकार हैं? इतने दशकों पश्चात पितृव्य भीष्म के हस्तिनापुर की राज गद्दी को छोड़ने के त्याग का कोई महत्व है या नहीं। भीष्म का राजकीय विषयों में अधिकार क्या एक निर्णायक का है या केवल अब वे उपदेशक मात्र रह गए हैं। क्या वे उपदेशक भी हैं कि नहीं ? युधिष्ठिर का हस्तिनापुर पर शासन करने का यदि अधिकार है, तो उस अधिकार का श्रोत क्या है? अंततः क्या किसी को किसी पर भी राज करने का अधिकार है?
(पितृव्य = paternal - salutation used by author for Bheeshma; उपदेशक = mentor; श्रोत=source)
इस उपन्यास में इन प्रकार के अनेक प्रश्न महाभारत के घटनाक्रम को अलंकृत एवं सुसज्जित करते चलते हैं। क्या ये प्रश्न केवल आध्यात्मिक हैं या क्या इनका हमारे वास्तविक भौतिक गतिविधियों से कोई सम्बंध हो सकता है?
(अलंकृत = adorned; आध्यात्मिक = spiritual)
मेरे मन में किंतु कुछ और ही प्रश्न उभर गए। क्या लेखक का दायित्व केवल पाठकों को एक प्रश्नावली देकर उन्हें सोचने में बाध्य करना ही है? क्या लेखक को कम से कम सांकेतिक तौर से ही सही, उठाए गए प्रश्नों के उत्तर नहीं देने चाहिए? यदि कोई पुस्तक प्रश्नों को अनिर्णीत छोड़ दे तो क्या उस पुस्तक का कोई लाभ हैं? वहीं दूसरी ओर यदि लेखक प्रश्नों पर अपना दृष्टिकोण देता है और वे मत पाठक के पूर्वग्रहीत विचारों से भिन्न हों तो क्या वे उसे स्वीकार करेगा?
(अनिर्णीत = undecided)
ये सब सोचते हुए, अंत में मेरे मन में सबसे बड़ा प्रश्न उठा कि क्या लेखक वस्तुतः पाठकों के लिए लिखता है या फिर सिर्फ़ अपने लिए? - जैसे ये समीक्षा मैंने केवल अपने लिए ही लिखी है।
- अनुज कक्कड़